Monday, February 6, 2012

आंखे मेरी !

सूखी हैं
कुछ रुख़ी हैं
आंखे मेरी अब रोती नहीं हैं

कहती हैं
कभी पूछती हैं
आंखे मेरी अब ख़ामोश नहीं हैं

रुठती हैं
फिर मनाती हैं
आंखे मेरी बाज़ आती नहीं हैं

नादानी हैं
अनकही कहानी हैं
आंखे मेरी कुछ समझाती नहीं हैं

आज काजल सजाया है
नूर तुझे बनाया है
आंखे मेरी अब शरमाती ज़रा हैं

Thursday, February 2, 2012

Finding the signs

We may think at times that the only thing life offers us tomorrow, is to repeat everything we did today. But if we pay close attention, we will see that no two days are alike.
Each morning brings a hidden blessing; a blessing which is unique to that day, and which cannot be kept or re-used. If we do not use this miracle today, it will be lost.

This miracle is in the small things of daily life; we must live in the understanding that at every moment there is a way out of each problem, the way of finding that which is missing, the right clue to the decision which must be taken in order to change our entire future.
But how to find the courage for this? As I see it, God speaks to us through signs. It is an individual language which requires faith and discipline in order to be fully absorbed.

The monks of the desert used to say it was important to allow angels to act. They occasionally did absurd things – such as talk to flowers or laugh without a reason. The alchemists followed the “signs of God”; clues which often made no sense, but which always lead somewhere.


“Modern man tried to eliminate life’s uncertainties and doubts. And in doing so he left his soul dying of hunger; the soul feeds off mysteries” – says the dean of Saint Francis Cathedral.

---by PAULO COELHO on FEBRUARY 2, 2012

Sunday, October 16, 2011

काश.............
हां, ये “काश” शब्द आपकी ज़िंदगी को उस खालीपन से भर देता है जो आपको ताउम्र सालता है।
कुछ महीने पहले नोएडा एक्सपोसेंटर में एक कॉन्सर्ट होने वाला था.. शनिवार ग्यारह तारीख़.. तारीख़ भी इसलिए याद है क्योंकि दफ़्तर के गेट के पास एक खंभा है और उसी पर एक बड़ा सा पोस्टर चिपका था.. जितना बड़ा पोस्टर था उससे बड़ा नाम और काम उस शख़्सियत का था जिसका कॉन्सर्ट होने वाला था। उसी पोस्टर पर वक़्त-तारीख़-जगह का ज़िक्र था। मुझे तो जाना ही है... हर रोज़ दफ़्तर आते-जाते उस पोस्टर के पास से गुज़रते हुए ये तय किया करती थी।

वजह याद नहीं कि क्यों कॉन्सर्ट में जा नहीं सकी लेकिन अब ये तो कभी भूल नहीं पाऊंगी कि वो कॉन्सर्ट था.......................... जगजीत सिंह का

वो अब नहीं हैं.. दिल मानता ही नहीं। संगीत और ख़ासकर ग़ज़ल की कुछ ख़ास जानकारी नहीं है मुझे और शायद इसलिए जगजीत सिंह हम जैसे लोगों के लिए बहुत ख़ास हो जाते हैं क्योंकि जिन्हें इस विधा के बारे में नहीं पता, उन्हें गज़ल की क़शिश से रुबरु करवाने का श्रेय ही जगजीत सिंह को जाता है।

शायरी और उनकी आवाज़
दिल को छूता अंदाज़
कभी सिसकियों का हमराज़
कभी, फुरक़त का साज़

--

तुम्हारी गाई हर नज़्म
अब तुम पर ही वार दूं
कहां से लाऊं वो शब्द
जो क्या थे तुम, ये बयां कर सकें

--

कहीं उम्र जवां हुई
कहीं उम्र बीत गई
उम्र वो इश्क़ की थी
वो आवारा-इश्क़न हो गई

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नहीं हो यहां
पर दूर हो कहां
ज़िंदगी के दो सबसे गहरे रंग
जुदाई और मिलन
तुम बिन
ना शुरू होंगे और ना ख़त्म

Tuesday, September 6, 2011

लद्दाख़ डायरी-- पेज 2




"जो आंखों से देख लिया, और जिसने मन को झकझोर दिया.. उसे मानने से कोई इंकार करे भी तो कैसे"

चुभती हुई सूखी हवाओं और अंधेरे से घुप पहाड़ी की उस चोटी पर मैंने अपने साथी को यही कहा था... मौक़ा कोई मामूली नहीं था, हम दोनों के लिए बेहद ख़ास था..। पहले सोचा था एक पर्सनल और प्योर अनुभव है इसे किसी के साथ बाटूंगी नहीं लेकिन ये अनुभव हमारा निजी होते हुए भी उन तमाम "भटके" हुए लोगों के लिए हैं जो किस्मत के हारने से पहले हिम्मत हार जाते हैं और मंजिल मिलने से पहले रास्ता बदल लेते हैं..।
"भटके" शब्द पर ज़ोर इसलिए दिया क्योंकि जिस लम्हें का हाल बयां कर रही हूं, उस वक़्त मैं और मेरा साथी रास्ता भटक चुके थे..। लेह से क़रीब 125 किमी की दूरी पर नुब्रा वैली में घूमने अपने ग्रुप के साथ मैं गई और दो रातें हमने नुब्रा वैली के दो अलग अलग गांवों हुंदर और डिस्किट में बिताई..। एक रात हुंदर में बिताने के बाद अगली सुबह हमारा ड्राइवर सबसे पहले हमें घुमाने डिस्किट मॉनेस्ट्री ले गया.. डिस्किट मॉनेस्ट्री एक बहुत ही सुंदर पहाड़ी पर बनी हैं.. राजसी कपड़ों और आभूषण में सजे मैत्रेय बुद्ध की 32 मीटर ऊंची एक विशालकाय मूर्ति उस पहाड़ी पर विराजमान है, कुछ-कुछ ध्यान की मुद्रा में.. मानों ध्यान की उस मुद्रा में भी पूरी नुब्रा वैली को ज़िंदगी बिताते हुए देख रही है..। सामने पाकिस्तान को जाती श्योक नदी बहती है..। पहाड़, बादल, नीला आसमान, नदी, हवाएं और शांति.. यानी वो सबकुछ जो जन्नत में होने का एहसास देता है..। ख़ैर, हम गाड़ी से वहां पहुंचे लेकिन धूप और गर्मी इतनी तेज़ थी कि बुद्ध के सामने बैठकर ध्यान लगाना तो बहुत दूर की बात है, मूर्ति को निहार पाना तक नामुमक़िन था..। इसलिए कुछ तस्वीरें देखने के बाद हमने तय किया कि शाम के वक़्त जब धूप नहीं होगी, हम तब यहां आएंगे और मॉनेस्ट्री में कुछ वक़्त बिताएंगे..।
आस-पास के इलाके में शाम तक घूमने के बाद हम छह बजे वापस होटल पहुंचे और अपना सामान गाड़ी से उतारकर मॉनेस्ट्री जाने की तैयारी करने लगे..। इतने में सोचा गाड़ी से नहीं पैदल जाएंगे..। बाक़ी लोग थक गए थे इसलिए चढ़ाई पर पैदल चलने के एडवेंचर को एन्ज्वॉए करने की हिम्मत बाक़ी किसी ने नहीं की और हम दो लोग अपने मिशन मॉनेस्ट्री पर निकल पड़े..। हमने मॉनेस्ट्री तक जाने वाली सड़क पर चलना शुरु किया..। क्योंकि पहाड़ों पर सड़के घुमावदार होती हैं और मॉनेस्ट्री पहाड़ी की चोटी पर थी तो वहां तक पहुंचने के लिए सड़क के कम से कम पांच या छह घुमाव तो ज़रुर रहे होंगे..। हमने तय किया कि हम बुद्धा से मिलने सड़क से नहीं बल्कि शॉर्टकट से पहाड़ पर सीधे चढ़ते हुए जाएंगे..। हमने चलना शुरू किया.. पहले रफ़्तार से.. फिर थकते हुए, हांफते हुए फिर रुकते हुए हम चलते रहे..। कच्चे पहाड़ी रास्ते पर पैर कई बार फिसला भी लेकिन जब बुद्धा की झलक दिखाई देने लगी तो लगा कि अब तो क़रीब पहुंच गए हैं.. लेकिन इस बीच दिन ढ़लना शुरु हो या और पहाड़ों ने अंधेरे की चादर ओढ़नी शुरु कर दी..। दिल थोड़ा तेज़ धड़क रहा था क्योंकि एक अनजान रास्ता, दूर-दूर तक सुनसान माहौल और अंधेरा गहराता जा रहा था..। हालांकि इस बीच बुद्धा का सिंहासन रौशन हो गया.. और हमें पता चला कि रात के वक़्त इस तरह लाइटिंग कर दी जाती है मॉनेस्ट्री में..।
चलते चलते अचनाक रास्ता बंद हो गया.. आगे रास्ते को बंद करने के लिए जाली लगाई गई थी..। उसे देखते ही दिल धक्क सा हो गया..। हम दोनों को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें..। वापिस जाना भी समझदारी नहीं थी, आगे रास्ता बंद था और पहाड़ का शॉर्टकट या तो ऊपर ही ले जाता है या फिर नीचे.. दांए-बांए की कोई गुंजाइश ही नहीं थी..। हम भी कुछ ढ़ीठ थे, एक दूसरे को हिम्मत बंधाते हुए हमने उस घुप अंधेरे में तय किया कि हम इस तार की बैरिकेडिंग को छलांग मारकर पार करेंगे और आगे बढेंगे..। लेकिन डर लग रहा था कि अगर किसी ने यूं कूदते फांदते देख लिया तो हमारे इस साहस को किस तरह ट्रीट किया जाएगा.. दूसरी तरफ़ मैं ये भी याद करने की क़ोशिश कर रही थी कि ऐसे पहाड़ों पर किस तरह के जानवर होते हैं..। डरपोक मेरा साथी भी कम नहीं था..। उसने अपना डर ज़ाहिर किया कि "कहीं इस तार पर करंट तो नहीं दौड़ रहा होगा"..। मैंने न जाने क्या सोच कर कह दिया "नहीं"..। फिर उसने कांपते हुए हाथों से उसे छुआ और कहा "ठीक है"..। हमने फोन की लाइट जलाई और बड़ी मुश्किल से कूदते फांदते उस कंटीली तार को पार किया..।
बड़ी खुशी मिली (वैसी ही जैसी हर बेमतलब के नियम को तोड़कर मिलती है).. हम एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए और आगे बढ़े..।
बुद्धा अब बहुत ही क़रीब थे.. हम उन्हें पूरा तो नहीं देख पा रहे थे लेकिन उनके पास जो रौशनी थी वो हमें नज़र आ रही थी..। अब खुशी के साथ हम और रफ़्तार से बढ़ते चल रहे हैं..। मेरा दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था.. मैं बहुत डरी हुई थी और बस किसी भी तरह से बुद्धा तक पहुंच जाना चाहती थी..। हम दो मिनट तक ही चले होंगे कि एक सीढ़ीनुमा रास्ता दिखा.. लेकिन वो मॉनेस्ट्री का निचला हिस्सा था और उन सीढियों के साथ ही रास्ता एक बार फिर बंद हो गया..। मैंने आस-पास कुछ और रास्ते भी तलाशे लेकिन वो सब रास्ते बस पहाड़ों के वीरानों की ही तरफ़ इशारा कर रहे थे..।
हमें अब कोई शक़ नहीं था कि हम रास्ता भटक चुके हैं और कोई नहीं था जिससे पूछा जा सके कि कैसे बुद्धा तक जाएं..?
अंधेरे, अकेलेपन और डर ने हमें यही प्रेरणा दी कि अब वापस लौट जाना बेहतर है..। आए तो हम पहाड़ पर उल्टे-सीधे बेतरतीबी के साथ थे लेकिन अब वापस लौटने के लिए वो रास्ता ठीक नहीं था.. इसलिए हम नाकामयाबी से बोझिल मन के साथ लंबी सड़क की तरफ़ बढ़ चले..।
बुद्धा अब भी वैसे ही जम कर उस पहाड़ पर विराजमान थे..। बस हमने दूर से उन्हें निहारते हुए उनसे विदा ली क्योंकि अगले दिन हमें लेह वापस लौटना था..।
अलविदा कहते हुए मेरे साथी ने उन्हें देखते हुए कहा "सॉरी बुद्धा, हम आपसे मिलने नहीं आ सकते.. रास्ता मिला नहीं, क़ोशिश तो बहुत की थी.. अब हम वापस जा रहे हैं.. बॉए-बॉए"
हम एक-दूसरे को देखकर हंसे और लंबे घुमावदार रास्ते को अपनी क़िस्मत मानते हुए लौटने लगे.. बस अब तो ये लग रहा था किसी तरह दो-ढाई घंटे में बिना भटके, सही-सलामत हम होटल तक पहुंच जाए..।
ठंड बढ़ रही थी.. सन्नाटे को हवा का शोर चीर रहा था..। और हम चलते जा रहे थे..। सड़क का एक घुमाव ख़त्म हुआ और एक मोड़ आया..। हम जैसे ही मुड़ें.. सड़क में दो रास्ते नज़र आए..। एक रास्ता नीचे की तरफ़ जाता हुआ और दूसरा रास्ता मॉनेस्ट्री की दीवार से जुड़ा हुआ एक सीढ़ी की तरफ़ खुल रहा था..।
मॉनेस्ट्री की सफ़ेद दीवारों से लगी सीढ़िया काफ़ी लंबी थी और जब हमारी नज़रें आख़िरी सीढ़ी पर जाकर टिकी तो लगा ये क्या..? "हे भगवान, ये सीढ़ी तो बुद्धा के क़दमों पर जाकर ख़त्म होती हैं"
हमें यक़ीन नहीं हो रहा था कि ये कैसे हो गया.. हम तो वापस लौट रहे थे लेकिन यहां रास्ता हमें अपनी तरफ़ बुला रहा था..।
सिर्फ़ हम ही नहीं बुद्धा भी हमसे मिलना चाहते थे.. वो हैं ! हमें देख भी रहे थे और सुन भी रहे थे और अपने होने का एहसास करा चुके थे..। और मैंने कहा..
"जो आंखों से देख लिया, और जिसने मन को झकझोर दिया.. उसे मानने से कोई इंकार करे भी तो कैसे"
बुद्धा का दिखाया हुआ रास्ता मिलने के बाद खुशी का ठिकाना नहीं रहा.. थके हुए पैरों में ख़ुद-ब-ख़ुद नई ताक़त लौट आई और हम भागते हुए सीढ़ियों पर चढ़े और बुद्धा के क़दमों में जाकर ही रुके..। आंखों में क़ामयाबी की चमक़ थी.. दिल में बुद्धा के लिए प्यार-आभार और लबों पर हंसी..।
मैं बुद्धा की विशालकाय मूर्ति के ठीक सामने बैठ गई और उन्हें निहारती रही.. कभी उनकी आंखों को, कभी उनकी ध्यान की मुद्रा को और कभी उनकी मूर्ति पर सजाए गए चटक रंगों को..। बुद्धा से पुराना रिश्ता है मेरा.. लेकिन ऐसा लगा लद्दाख़ ने उस रिश्तें में फिर जान फूंक दी..। मैंने आंखें बंद कर ली..................................
और आंखें खोलने के बाद अपने साथी को पूछा "अब वापस कैसे जाएंगे'.. उसने मुझे रिलैक्स होने का इशारा किया और कहा "अगर बुद्धा ने हमें यहां बुलाया है तो जाने का इंतज़ाम भी वो ख़ुद करेंगे".. ये सुनकर मैंने फिर आंखे बंद कर ली..।
कुछ देर बाद एक आहट से मेरी आंख खुली..। देखा तो चार लोग मॉनेस्ट्री में दाख़िल हुए..। एक महिला और तीन पुरुष.. वो मूर्ति की तस्वीरें खींच रहे थे हमने एक दूसरे को "जुलै" कहा..। मैंने फिर अपने साथी को पूछा "क्या हम इनसे लिफ्ट लेंगे वापिसी के लिए".. ? मेरे साथी ने फिर कहा "नहीं.. हम नहीं पूछेंगे, बुद्धा ने बुलाया है तो ये ख़ुद हमसे साथ चलने के लिए पूछेंगे"..
तस्वीर कुछ बदल गई थी.. रास्ता भटकने से रास्ता खोजने तक बुद्धा हमारा इम्तहान ले रहे थे लेकिन अब हम बुद्धा के प्रेम और सानिध्य का इम्तहान ले रहे थे..।
हम लौटने के लिए उठे.. उन चार लोगों में से एक सीढ़ी के पास खड़ा था.. हमने उससे पूछा कि "ये मॉनेस्ट्री कब तक खुली रहती है और क्या कोई यहां रहता भी है".. ? उसने जवाब दिया "मॉनेस्ट्री रातभर खुली रहती है और यहां मॉनेस्ट्री के एक कमरे में एक बूढ़े लामा रहते हैं".. हम लामाजी से मिलना चाहते थे और बुद्धा के बारे में कुछ जानना चाहते थे तो वो आदमी हमे रास्ता दिखाने के लिए हमारे साथ चल पड़ा..। बातों ही बातों में पता चला कि वो ड्राइवर है जो उस परिवार को घुमाने लाया है..। और वो काफ़ी हैरान हुआ ये जानकर कि हम पैदल यहां तक आए हैं..।
हम लामाजी के पास पहुंचे वो काफ़ी गर्मजोशी से हमसे मिले और बहुत खुश हुए.. उन्होंने बौद्ध धर्म, भगवान बुद्ध और मॉनेस्ट्री के बारे में कई अहम जानकारियां दी..। साथ ही जो सवाल मेरे मन में भगवान बुद्ध के मैत्रेय रुप को देखकर पैदा हुआ था, उसका भी उन्होंने जवाब दिया कि बुद्ध की ये विशालकाय मूर्ति, भगवान गौतम बुद्ध की नहीं बल्कि "फ्यूचर बुद्धा" की है जिन्हें मैत्रेय बुद्ध कहा जाता है..।
लामाजी से बातचीत चल ही रही थी कि वो ड्राइवर फिर हमारे पास आया और बोला कि "हमारे साहब ने बोला है कि आपको होटल तक छोड़ देंगे.. चलिए हमारे साथ"
साथ चलने के न्योता बेशक़ उन साहब का था जिन्होंने हमें हमारे होटल तक पहुंचाया और जो बाद में मिजोरम के डीजीपी निकले.. लेकिन हमारे लिए तो वो साहब बुद्धा के मैसेंजर थे जिन्होंने हमें बुद्धा की महिमा और करिश्में पर यक़ीन करना सिखाया..।
हां, करिश्मा ही था.. क्योंकि ये मुलाकात इसी तरह से और ऐसे हालात ही में होनी तय थी और शायद इसीलिए दिन में पूरे ग्रुप के साथ होने के बावजूद बुद्धा ने हमें शाम को फिर बुलाया.. और हमें एहसास कराया कि वो हैं... रुप चाहे कोई भी हो..।
आप इस पूरी घटना को संयोग भी मान सकते हैं लेकिन यक़ीन मानिए मैजिक होते हैं लेकिन सिर्फ़ उनके लिए जो मैजिक्स पर यक़ीन करते हैं..।

------------------------ कुछ और बातें बाक़ी हैं :-)

Friday, September 2, 2011

लद्दाख़ डायरी-- पेज 1

जुलै
सुनने में अजीब लगा ना। हां मुझे भी लगा था लेकिन अब नहीं लगता। बल्कि अब तो कहने में एक प्यारा सा और सुनने में बड़ा ही मीठा सा संबोधन लगता है।
मैं लेह लद्दाख़ घूम कर आई.. और यादों के जो तोहफ़े साथ लेकर आई उनमें सबसे ख़ूबसूरत चीज़ यही लफ़्ज़ है।

मुझे आज भी इसका सही अर्थ नहीं पता लेकिन जितना सुन सुनकर समझ पाई वो यही कि लद्दाख़ी भाषा में “जुलै” शब्द का इस्तेमाल ठीक उसी तरह किया जाता है जिस तरह हम “हाए- हैलो” या “सलाम-नमस्ते” या फिर "अलविदा, अल्लाह-हाफ़िज़" एक दूसरे को कहते हैं। और मज़े की बात ये है कि “जुलै” विश करते वक़्त आपको किसी की उम्र का, किसी के रुतबे का या फिर किसी से क्या रिश्ता है इसका ख़्याल रखना नहीं पड़ता। इसलिए लेह-लद्दाख़ के गली-कूचों या सड़कों या फिर गांव-कस्बों में घूमते हुए, ये एक लफ़्ज़ “जुलै” हमें सबसे जोड़ता था।

क्या छोटे-छोटे तीन चार साल के बच्चे जो हम मुसाफ़िरों की गाड़ी को गुज़रते हुए देख कर “’टाटा-बाए बाए” करते थे और ज़ोर से ज़ोर से “जुलै” चिल्लाते हुए अपना पैग़ाम हम तक पहुंचाते थे।
क्या कोई होटल मालिक, किसी ढ़ाबे या रेस्टोरेंट का मालिक या फिर कोई कुछ बेचने वाला “जुलै” कहकर सम्मान के साथ अपने पास बुलाते थे।

लेह-लद्दाख़ के पहाड़ी रास्ते काफ़ी लंबे लगते थे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने के लिए... और उन रास्तों में हम तो फिर भी गाड़ी से चल रहे होते थे लेकिन गांव के कुछ लोग जो पैदल ही उन लंबे रास्तों को अपनी रफ़्तार से चुनौती दे रहे होते थे... कभी-कभी “जुलै” करते.. फिर हम भी उनका “जुलै” क़बूल करके उन्हें मुस्कुरा कर जवाब देते.. फिर यूंही बातचीत का कुछ सिलसिला चल निकलता और उन्हें गाड़ी में लिफ्ट मिल जाती और हमें अपने सफ़र के हमसफ़र मिल जाते।

“जुलै” से जुड़ा एक शानदार किस्सा अगर बांटा नहीं तो शायद ये लेख अधूरा रह जाएगा। लोग वहां एक-दूसरे को “जुलै” बोलकर विश करते हैं ये नोटिस करने में मुझे एक दिन का वक़्त लग गया.. क्योंकि पहले इस बात पर ध्यान ही नहीं गया कि कैसे हमारा ड्राइवर या फिर टूर मैनेजर या कोई और लद्दाख़ी बातचीत की शुरुआत कर रहा है। हम अपने टूर मैनेजर के ऑफिस में बैठे थे कि तभी एक विदेशी महिला अंदर आई.. उसने मुस्कुराते हुए मुझे और टूर मैनेजर को “जुलै” कहा.. टूर मैनेजर ने भी जवाब में “जुलै” कहा.. अब क्योंकि मैं “जुलै” से अनजान थी तो मुझे लगा शायद उस महिला ने ख़ुद को इंट्रोड्यूस कराते हुए अपना नाम बताया है..............."जूली"

लद्दाख़ी लोग आपस में बात करते हुए लद्दाख़ी भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं.. लेकिन लद्दाखी भाषा का “जुलै” तो अब न लद्दाख़ी था और ना ही हिंदी और ना ही अंग्रेज़ी.. क्योंकि “जुलै” एक भाव बन चुका था.. एक ऐसा भाव जो एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़ रहा था।


---------------------- लद्दाख़ डायरी के कुछ और पन्ने बाक़ी है पोस्ट करने :-)

Monday, June 13, 2011

“Let it go”

कई बार सुना है, पढ़ा भी है और कई लोगों ने समझाया भी है “Let it go”
लेकिन ज़िंदगी सिर्फ़ पढ़-लिख जाने या सुनने-सुनाने का तो नाम नहीं है ना, उसे तो जीना पड़ता है और अनुभवों के साथ समझना पड़ता है और कभी-कभी किसी सिद्धि की तरह साधना भी पड़ता है..।
शायद आज के वक़्त में “Let it go” सीख लेना भी किसी सिद्धि से कम नहीं..।
ऐसा इसलिए कह रही हूं क्योंकि हम सभी अपने ज़िंदगी में हुई कुछ घटनाओं, लोगों, रिश्तों, परिस्थितियों और कभी-कभी ख़ुद से भी आहत होते हैं..। और ऐसे में “Let it go” की दवा तो कोई तब इस्तेमाल करे ना जब दिल उन ग़मों को भूलने दे और दिमाग़ यादों को अपने ‘डेटा बेस’ से मिटने दे..। दिल और दिमाग़ की ये कमज़ोरी, “Let it go” का कवच आत्मा को ओढ़ाने की ताक़त जुटा नहीं पाती और हम बार-बार चुभती यादों से रह रहकर ज़ख़्मी होने से बाज़ नहीं आते.. और ग़म का ख़ज़ाना ढोए रहते हैं सिर्फ़ इस आस में की कभी तो वक़्त बदलेगा.. कोई हमें समझेगा या फिर ऊपरवाले की रहमत होगी और हमारे दुखों के हिसाब चुकता होंगे..।
ये नहीं कहूंगी कि मैं इसे साध पाई हूं लेकिन एक अनुभव हुआ है जो सचमुच उम्मीदें बंधाता है..।
पॉज़िटिविटी की चाबी “Let it go” के दरवाजे़ ज़रुर खोलती है..। एक छोटी सी पॉजिटिव चीज़ जिसने सिर्फ़ एक दिन या सिर्फ़ कुछ लम्हों के लिए ही सही, अगर आपको नई ऊर्जा दी हो, नया साहस दिया हो या नया विज़न दिया हो तो आप “Let it go” की कला सीख सकते हैं..।
मामूली सी बात है पर देखिए, आज मैंने पिछले काफ़ी वक़्त से अटका एक काम पूरा कर लिया तो अपने आप से ऐसा लगने लगा जैसे और भी बहुत सी चीजें हैं, जिन्हें मैं निपटा सकती हूं..। कुछ बाते जिन्हें नज़रअंदाज़ कर रही हूं उन्हें सुधार सकती हूं..। कुछ रुठे हुए को मना सकती हूं..। कुछ बिखरे पन्नों को भी फिर सहेज सकती हूं..। कुछ झगड़ों को बातचीत के ज़रिए मिटा सकती हूं..। भूले हुए वादों को फिर निभा सकती हूं..।
और इन एहसासों को हक़ीक़त में बदलने के लिए बार-बार दोहरा सकती हूं “Let it go”
क्योंकि “Let it go” परिस्थितियों को क़बूल करके उनकी उलझनों के साथ आगे बढ़ जाने का नाम नहीं.. बल्कि ज़िंदगी को ख़ूबसूरत बनाने के लिए अपने इरादों के साथ मज़बूती से बढ़ने और “Now , Let it go” कहने का नाम है..।

(P.S- “Let it go” की अपनी परिभाषा देकर किसी की भावनाओं को आहत करना मेरा मक़सद नहीं है.. क्योंकि ये मेरे निजी विचार हैं)

Wednesday, June 1, 2011

जब ज़ैदी भारत आए....

अमेरिका की इराक़ में क्या औक़ात है, इसे बेख़ौफ़ी के साथ 'मुतंजर अल ज़ैदी' ने पूरी दुनिया को जिस अंदाज़ में बताया था, कम से कम उसे मैं तो कभी नहीं भूल सकती..। (बुश की बात तो रहने ही दीजिए)
कुछ दिनों पहले मुतंजर अल ज़ैदी भारत आए थे.. मीडिया में इस बात को कुछ ख़ास कवरेज नहीं मिली.. लेकिन ज़ैदी का एक इंटरव्यू पढ़ा, उसका लिंक पोस्ट कर रही हूं..।
आपको भी ज़ैदी की शख़्सियत के जूता फेंकने वाले पहलू के अलावा दूसरा पहलू देखने को मिलेगा..।

इंटरव्यू पार्ट-1
http://bhadas4media.com/interview/11276-2011-05-24-12-50-52.html

इंटरव्यू पार्ट-2
http://bhadas4media.com/interview/11283-2011-05-25-07-40-26.html